सौरभ द्विवेदी ने छोड़ा ‘द लल्लनटॉप’: क्या यह डिजिटल पत्रकारिता के एक युग का अंत है? Saurabh Dwivedi
भारतीय डिजिटल मीडिया की दुनिया में आज एक ऐसी हलचल मची है जिसने हर उस शख्स को चौंका दिया है जो खबरें देखने के लिए यूट्यूब का सहारा लेता है। ‘द लल्लनटॉप’ (The Lallantop) के संस्थापक और हम सबके चहेते पत्रकार सौरभ द्विवेदी ने जनवरी 2026 में संस्थान से इस्तीफा दे दिया है।
“नमस्ते, मैं हूँ सौरभ द्विवेदी…”—इस एक वाक्य ने न जाने कितने घरों में मोबाइल स्क्रीन को खबरों का अड्डा बना दिया। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या लल्लनटॉप का वह देसी अंदाज सौरभ के बिना पहले जैसा रह पाएगा? और उससे भी बड़ा सवाल—सौरभ द्विवेदी अब आगे क्या करने वाले हैं?
एक पत्रकार जिसने हिंदी न्यूज़ की परिभाषा बदल दी Saurabh Dwivedi
सौरभ द्विवेदी कोई साधारण नाम नहीं है। यह उस पत्रकार का नाम है जिसने कोट-पैंट और टाई वाली ‘गंभीर’ पत्रकारिता के दौर में हाथ में गमछा लेकर और अपनी देसी बुंदेलखंडी शैली में खबरें सुनाकर करोड़ों भारतीयों का दिल जीता। उन्होंने पत्रकारिता को स्टूडियो की चकाचौंध से निकालकर गांव की चौपालों तक पहुँचाया।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से शिक्षा प्राप्त करने वाले सौरभ ने नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर जैसे संस्थानों में अपनी कलम का लोहा मनवाया। लेकिन उनकी असली पहचान तब बनी जब उन्होंने इंडिया टुडे ग्रुप के साथ मिलकर ‘द लल्लनटॉप’ की शुरुआत की।
‘नेतानगरी’ से ‘दुनियादारी’ तक: एक शानदार सफर
लल्लनटॉप को शिखर पर ले जाने में सौरभ द्विवेदी के कुछ खास कार्यक्रमों का बहुत बड़ा हाथ रहा है।
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नेतानगरी: राजनेताओं के साथ तीखी लेकिन मज़ेदार बातचीत।
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दुनियादारी: जटिल अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को इतनी सरल भाषा में समझाना कि एक आम आदमी भी समझ सके।
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चुनावी यात्रा: तपती धूप में अपनी टीम के साथ धूल भरी सड़कों पर घूमकर ‘जनता का मूड’ टटोलना।
यही वह खासियतें थीं जिसने लल्लनटॉप को महज एक न्यूज़ चैनल नहीं, बल्कि एक ‘इमोशन’ बना दिया। सौरभ ने दिखाया कि खबरें केवल जानकारी नहीं होतीं, बल्कि वे एक कहानी की तरह सुनाई जा सकती हैं।
इस्तीफे के पीछे की असली कहानी और भविष्य के संकेत
जनवरी 2026 की शुरुआत में जैसे ही सौरभ द्विवेदी के इस्तीफे की खबर आई, सोशल मीडिया पर चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। हालांकि उन्होंने अपने इस्तीफे के पीछे के कारणों को बहुत व्यक्तिगत और ‘नए पड़ाव की तलाश’ बताया है, लेकिन उनके चाहने वाले इसे एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं।
खबरों की मानें तो सौरभ द्विवेदी अपनी खुद की एक नई स्वतंत्र डिजिटल मीडिया वेंचर शुरू करने का मन बना रहे हैं। उनके संकेतों से साफ है कि वह एक बार फिर से उस स्वतंत्र पत्रकारिता की ओर लौटना चाहते हैं जहाँ किसी कॉर्पोरेट प्रेशर के बजाय सीधे जनता से जुड़ाव हो।
क्या लल्लनटॉप के लिए यह एक बड़ा झटका है?
बेशक, सौरभ द्विवेदी लल्लनटॉप का चेहरा और उसकी आत्मा दोनों थे। उनका इस्तीफा संस्थान के लिए एक बड़ी चुनौती है। डिजिटल पत्रकारिता में अक्सर ‘ब्रांड’ से ज्यादा ‘चेहरा’ महत्वपूर्ण होता है। जब दर्शक लल्लनटॉप खोलते थे, तो वे असल में सौरभ को सुनने आते थे। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी जगह लेने वाला नया एंकर क्या उसी साख को बरकरार रख पाएगा?
निष्कर्ष: अगले अध्याय का इंतजार
सौरभ द्विवेदी का जाना किसी अंत की तरह नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की तरह देखा जाना चाहिए। भारतीय मीडिया जगत में जब भी डिजिटल क्रांति का जिक्र होगा, सौरभ द्विवेदी का नाम सुनहरे अक्षरों में लिया जाएगा। उनके अगले कदम को लेकर उत्सुकता लाजमी है क्योंकि जहाँ भी सौरभ होंगे, वहां ‘किस्से-कहानियां’ और ‘बेबाक खबरें’ जरूर होंगी।
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