असरानी का 85वां जन्मदिन: कालीन बेचने की सलाह से लेकर बॉलीवुड के ‘कॉमेडी किंग’ बनने तक का महा-सफर
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जिन्हें देखते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। असरानी एक ऐसा ही नाम है. आज असरानी अपना 85वां जन्मदिन मना रहे हैं. जयपुर की तंग गलियों से निकलकर मायानगरी मुंबई के ‘सदाबहार कॉमेडियन’ बनने तक का उनका सफर किसी फिल्मी स्क्रिप्ट की तरह उतार-चढ़ाव से भरा रहा है.
असरानी ने न केवल दर्शकों को हंसाया, बल्कि यह भी साबित किया कि अगर प्रतिभा के साथ सही प्रशिक्षण जुड़ जाए, तो सफलता निश्चित है.
1. शुरुआती जीवन: जब परिवार चाहता था पुश्तैनी धंधा संभालना
बहुत कम लोग जानते हैं कि असरानी का पूरा नाम गोवर्धन असरानी है. उनका जन्म जयपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था. उनके पिता की जयपुर में कालीन (Carpet) की दुकान थी. उनका परिवार चाहता था कि गोवर्धन बड़ा होकर इसी व्यवसाय को संभाले, लेकिन उनकी रुचि बचपन से ही अभिनय और फिल्मों में थी.
अपनी पढ़ाई का खर्च वहन करने के लिए उन्होंने ‘ऑल इंडिया रेडियो’ में वॉइस आर्टिस्ट के रूप में काम करना शुरू किया. उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा जयपुर के सेंट जेवियर्स स्कूल से और स्नातक राजस्थान कॉलेज से पूरा किया. कॉलेज के दिनों में वह नाटकों और रेडियो कार्यक्रमों में सक्रिय रहते थे, जिससे उन्हें अभिनय की दुनिया में कदम रखने का आत्मविश्वास मिला.
2. मुंबई की पहली हार और ‘नौशाद’ के नाम की वो चिट्ठी
जयपुर में असरानी के पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति संगीत निर्देशक नौशाद अली के रिश्तेदार थे. उन्होंने असरानी के टैलेंट को देखते हुए नौशाद साहब के नाम एक सिफारिशी पत्र लिख दिया. असरानी बड़े उत्साह के साथ जयपुर से मुंबई के लिए निकले, उन्हें लगा कि अब तो काम आसानी से मिल जाएगा.
लेकिन मुंबई की चमक के पीछे का अंधेरा बहुत गहरा था. नौशाद साहब का बंगला ‘आशियाना’ ढूंढने में उन्हें एक महीना लग गया. जब वह वहां पहुंचे, तो दरबान ने उन्हें एक महीने बाद आने को कह दिया. अंत में, एक साल के संघर्ष के बाद उन्हें फिल्म ‘खोटा पैसा’ में एक छोटा सा रोल मिला, जिसमें उन्हें बस एक लाइन में खड़ा होना था. उनके पास खुद का सूट तक नहीं था, इसलिए उन्होंने अपने 6 फुट लंबे मामा का सूट पहनकर शूटिंग की. अंततः, निराश होकर वह वापस जयपुर लौट गए.
3. FTII और अभिनय की बारीकियां
जयपुर लौटने पर उनके परिवार ने उन्हें फिर से कालीन की दुकान संभालने की सलाह दी. लेकिन असरानी के मन में अभिनय की आग अभी ठंडी नहीं हुई थी. उन्हें पता चला कि पुणे के FTII (Film and Television Institute of India) में एक्टिंग का प्रोफेशनल कोर्स शुरू हो रहा है. उन्होंने वहां आवेदन किया और उनका चयन हो गया.
FTII में उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं, लेकिन कोर्स पूरा करने के बाद भी रास्ता आसान नहीं था. लोग उन पर तंज कसते थे कि “क्या एक्टिंग सर्टिफिकेट से होती है? बड़े सितारों ने तो कोई ट्रेनिंग नहीं ली”.
4. जब इंदिरा गांधी ने बदल दी किस्मत
एक ऐतिहासिक मोड़ तब आया जब तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी पुणे आईं. असरानी और उनके साथियों ने उनसे मुलाकात की और शिकायत की कि प्रशिक्षण के बावजूद उन्हें फिल्म इंडस्ट्री में काम नहीं मिल रहा है. इंदिरा गांधी ने उनकी बात ध्यान से सुनी और मुंबई आकर फिल्म निर्माताओं से कहा कि FTII के प्रशिक्षित कलाकारों को मौका दिया जाना चाहिए.
यहीं से असरानी का भाग्य बदला और उन्हें और जया भादुड़ी (बच्चन) को ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘गुड्डी’ (1971) में काम मिला.

5. ‘शोले’ का वो कालजयी किरदार: “हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं”
असरानी के करियर की सबसे बड़ी पहचान फिल्म ‘शोले’ (1975) का जेलर वाला रोल है. इस किरदार की तैयारी के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। निर्देशक रमेश सिप्पी और लेखक सलीम-जावेद ने उन्हें एक छोटा सा रूम में बुलाया और सिर्फ दो-चार पन्नों की स्क्रिप्ट दी.
सलीम-जावेद ने उन्हें एडोल्फ हिटलर की 12-13 फोटो वाली एक किताब दी और बताया कि यह पात्र खुद को दुनिया का सबसे समझदार आदमी समझता है. असरानी ने हिटलर के हाव-भाव और चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘द ग्रेट डिक्टेटर’ देखकर अपने किरदार को निखारा. उन्होंने मोहन स्टूडियो में पूरी वर्दी और मूंछों के साथ जब अपनी चाल दिखाई, तो वह तुरंत सिलेक्ट हो गए.
क्या आप जानते हैं? ‘शोले’ की लंबाई अधिक होने के कारण असरानी का जेलर वाला सीन काट दिया गया था. लेकिन साउंड रिकॉर्डिस्ट मंगेश देसाई के कहने पर और बाद में नागपुर के एक पत्रकार की पहल पर इसे फिर से जोड़ा गया, जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित कॉमेडी सीन बना.
6. जया और अमिताभ बच्चन के साथ गहरा रिश्ता
असरानी का जया बच्चन के साथ रिश्ता केवल सह-कलाकारों का नहीं, बल्कि भाई-बहन जैसा रहा है. FTII में असरानी जया के टीचर थे, जहां उन्होंने उन्हें अभिनय सिखाया था. अमिताभ बच्चन से उनकी पहली मुलाकात भी जया के जरिए ही हुई थी. कई बार जब जया के घर प्रोड्यूसर्स बैठे होते थे, तो अमिताभ चुपचाप ऊपर असरानी के घर आकर बैठ जाते थे. अमिताभ और जया की शादी में असरानी दुल्हन के भाइयों में से एक थे.
7. कॉमेडी के अलावा गंभीर और नकारात्मक भूमिकाएं
असरानी को अक्सर कॉमेडी के लिए ही याद किया जाता है, लेकिन उन्होंने कई फिल्मों में गंभीर और नकारात्मक किरदार भी निभाए. गुलजार की फिल्म ‘कोशिश’ (1972) में उन्होंने ‘कानू’ नाम का एक बेहद लालची और नकारात्मक किरदार निभाया था, जो अपनी ही गूंगी-बहरी बहन का फायदा उठाता है. इस फिल्म के बाद लोगों ने उनसे कहा था, “ऐसे रोल मत करो, तुम्हारे हाथ से बच्चा मर जाए तो बुरा लगेगा”. उन्होंने ‘अभिमान’, ‘चैताली’, और ‘तेरी मेहरबानियां’ जैसी फिल्मों में भी अपनी बहुमुखी प्रतिभा दिखाई.

8. गुजराती सिनेमा के ‘चॉकलेट हीरो’
असरानी का जादू केवल हिंदी ही नहीं, बल्कि गुजराती फिल्मों में भी चला. उन्होंने लगभग 10 वर्षों तक गुजराती फिल्मों में मुख्य अभिनेता (Lead Role) के रूप में काम किया. 1974 में उन्होंने ‘हुं अमदावाद नो रिक्षवालो’ फिल्म निर्देशित की, जिसका टाइटल सॉन्ग आज भी अहमदाबाद के लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है. उन्होंने ‘सात केडी’, ‘संसार चक्र’, और ‘पंखी नो मालो’ जैसी कई सफल गुजराती फिल्मों में काम किया.
9. पुरस्कार और सम्मान
असरानी को उनके शानदार अभिनय के लिए कई बार सम्मानित किया गया है:
| साल | फिल्म | श्रेणी | पुरस्कार |
| 1973 | अनहोनी | बेस्ट कॉमेडियन | शमा सुष्मा अवार्ड |
| 1974 | आज की ताजा खबर | बेस्ट कॉमिक रोल | फिल्मफेयर अवार्ड |
| 1977 | बालिका वधू | बेस्ट कॉमिक रोल | फिल्मफेयर अवार्ड |
| 1986 | सात केडी | बेस्ट एक्टर और डायरेक्टर | गुजरात सरकार पुरस्कार |

10. असरानी का वर्तमान और भविष्य की फिल्में
असरानी आज भी अभिनय की दुनिया में सक्रिय हैं। हाल ही में 20 अक्टूबर 2025 के आसपास उनकी फिल्म ‘किस किसको प्यार करूं 2’ चर्चा में रही थी. आज उनके जन्मदिन के अवसर पर फिल्म ‘इक्कीस’ रिलीज हो रही है, जिसमें दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र भी नजर आएंगे (यह धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म बताई जा रही है). इसके अलावा, 2026 में उनकी आगामी फिल्में ‘भूत बंगला’ और ‘हैवान’ रिलीज होने की उम्मीद है.
असरानी ने अपने करियर में 300 से अधिक फिल्मों में काम किया है. उनका सफर हमें सिखाता है कि सफलता के लिए केवल सपनों का होना काफी नहीं है, बल्कि सही प्रशिक्षण और निरंतर संघर्ष भी अनिवार्य है.
असरानी का कौन सा डायलॉग या फिल्म आपकी पसंदीदा है? हमें कमेंट में बताएं और इस महान कलाकार को उनके जन्मदिन पर शुभकामनाएं दें!
One thought on “असरानी का 85वां जन्मदिन : कालीन की दुकान से ‘जेलर’ और बॉलीवुड कॉमेडी किंग बनने तक का पूरा सफर”