Chhath Puja 2026: History, Mahatva aur Bharat me Utsav Tab aur Ab

Hindu women offering Arghya to rising Sun during Chhath Puja, standing in river with traditional saree and bamboo baskets filled with fruits and diyas. “छठ पूजा के शुभ अवसर पर उगते सूरज को अर्घ्य अर्पित करती महिलाएं।”

🌅 छठ पूजा chhath puja का इतिहास, भारत में उत्सव और इसका महत्व — तब और अब


✨ भूमिका
भारत एक आध्यात्मिक देश है जहाँ हर पर्व में प्रकृति, संस्कृति और मानवीय भावनाएँ एक साथ जुड़ी होती हैं। इन्हीं पर्वों में से एक है छठ पूजा, जो न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि पर्यावरण और समाज की दृष्टि से भी अत्यंत पवित्र मानी जाती है।

 

Hindu devotees performing Chhath Puja standing in river water, offering Arghya to the Sun God during sunrise, wearing colorful traditional clothes.
“छठ पूजा के दौरान श्रद्धालु नदी में खड़े होकर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हुए।”


यह पर्व सूर्य भगवान और छठी माई (षष्ठी देवी) को समर्पित है। इसकी परंपरा हजारों वर्षों पुरानी मानी जाती है, और यह आज भी पूरे भारत में श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ मनाई जाती है।


🌞 छठ पूजा का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
छठ पूजा की उत्पत्ति वैदिक काल से जुड़ी हुई है। उस समय सूर्योपासना (सूर्य की आराधना) को जीवन का अनिवार्य हिस्सा माना जाता था।
वेदों में “सूर्य” को जीवनदाता, स्वास्थ्य का स्रोत और ऊर्जा का प्रतीक बताया गया है।
“ऋग्वेद” और “अथर्ववेद” में सूर्यदेव की उपासना के कई मंत्र मिलते हैं — जिनमें कहा गया है कि सूर्य की किरणें मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा को शुद्ध करती हैं। इसी आधार पर छठ पूजा का उद्भव माना जाता है।

🕉️ छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथाएँ
छठ पूजा के कई धार्मिक आख्यान हैं, जो इसके महत्व को और भी गहरा बनाते हैं।
1️⃣ राजा प्रियव्रत और संतान प्राप्ति की कथा
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा प्रियव्रत (स्वायंभुव मनु के पुत्र) को संतान प्राप्त नहीं हो रही थी।
महर्षि कश्यप ने उन्हें “षष्ठी देवी” की आराधना करने का निर्देश दिया।
राजा और उनकी पत्नी मालिनी ने छठ व्रत किया, जिससे उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ। तभी से यह व्रत संतान-सुख और परिवार की मंगल-कामना के लिए किया जाने लगा।
2️⃣ श्रीराम और माता सीता की कथा
रामायण काल में, जब भगवान श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास और रावण-वध के बाद अयोध्या लौटे, तब उन्होंने और माता सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्यदेव की उपासना की थी।
कहा जाता है कि सीता ने स्वयं नदी तट पर व्रत कर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया था।
इस घटना को छठ पूजा की परंपरा का आधार माना जाता है।

3️⃣ द्रौपदी और पांडवों की कथा
महाभारत में उल्लेख है कि द्रौपदी ने पांडवों की कठिनाइयों को दूर करने के लिए सूर्यदेव की पूजा की थी।
सूर्यदेव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि जब तक वह चाहें, उनके घर में कभी अन्न का अभाव नहीं रहेगा।
इस प्रकार यह व्रत सुख-समृद्धि और कल्याण का प्रतीक माना जाता है।
🌅 छठ पूजा का धार्मिक अर्थ और प्रतीकवाद
छठ पूजा केवल एक व्रत नहीं, बल्कि यह आत्म-संयम, स्वच्छता और श्रद्धा की पराकाष्ठा है।
व्रती (जो व्रत करते हैं) चार दिनों तक कठोर नियमों का पालन करते हैं।
इस पर्व का उद्देश्य शरीर और आत्मा की शुद्धि, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, और सकारात्मक ऊर्जा का संचार है।
छठ पूजा में सूर्य की पूजा दो बार की जाती है —
पहला अर्घ्य: सूर्यास्त के समय (संध्या अर्घ्य)
दूसरा अर्घ्य: अगले दिन सूर्योदय के समय (उषा अर्घ्य)
इन दोनों समयों पर सूर्य की किरणें सबसे मृदु होती हैं, और इन्हीं क्षणों में सूर्यदेव को अर्घ्य देने से जीवन में संतुलन और स्वास्थ्य प्राप्त होता है।

 

🪔 छठ पूजा की चार दिन की विधि


1️⃣ नहाय-खाय (पहला दिन)
इस दिन व्रती शुद्ध स्नान करते हैं, घर और आस-पास की सफाई की जाती है।
सात्विक भोजन जैसे चने की दाल, कद्दू की सब्जी और अरवा चावल बनाकर प्रसाद के रूप में खाया जाता है।
2️⃣ खरना (दूसरा दिन)
व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं। शाम को सूर्यास्त के बाद गुड़ और दूध से बनी खीर (रसीया) और रोटी खाकर व्रत खोलते हैं।
इस प्रसाद को पूरे परिवार और आस-पड़ोस में बाँटा जाता है।
3️⃣ संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन)
इस दिन व्रती घाट या नदी किनारे पहुँचकर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
डूबते सूर्य को जल अर्पित करने का अर्थ है — जीवन के हर उतार-चढ़ाव में भी कृतज्ञ रहना।

4️⃣ उषा अर्घ्य (चौथा दिन)
अगले दिन प्रातःकाल व्रती उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।
इसके बाद व्रत का पारायण (समापन) होता है।
🌍 भारत में छठ पूजा की उज़वनी — तब और अब
🕰️ तब — पारंपरिक युग
पहले के समय में छठ पूजा गाँवों और कस्बों तक सीमित थी।
नदी, तालाब या कुएँ के किनारे मिट्टी के घाट बनाए जाते थे।
लोग प्राकृतिक वस्त्र, मिट्टी के दीपक, बाँस की डलिया और केले के पत्तों से बने प्रसाद का उपयोग करते थे।
इस व्रत में दिखावा या वैभव नहीं, बल्कि सादगी और भक्ति प्रधान थी।

🏙️ अब — आधुनिक युग


आज छठ पूजा ने सीमाएँ तोड़ दी हैं।
भारत के हर राज्य के साथ-साथ नेपाल, मॉरिशस, अमेरिका, दुबई, लंदन और फिजी जैसे देशों में भी यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
शहरी इलाकों में कृत्रिम तालाब या बड़े घाट बनाए जाते हैं।
सरकारें सुरक्षा व्यवस्था, स्वच्छता अभियान और विशेष ट्रेनें तक चलाती हैं ताकि श्रद्धालु आसानी से पूजा स्थल तक पहुँच सकें।
सोशल मीडिया ने भी छठ पूजा को नई पहचान दी है —
लोग वीडियो, फोटो और भक्ति गीतों के माध्यम से इसे वैश्विक मंच पर पहुँचा रहे हैं।
भले ही समय बदला है, पर भावना वही है — सूर्यदेव और छठी माई के प्रति श्रद्धा।

🌿 छठ पूजा का सामाजिक और पर्यावरणीय महत्व


🌺 सामाजिक दृष्टि से
छठ पूजा समाज में एकता, सहयोग और समानता का प्रतीक है।
इस व्रत में गरीब-अमीर का भेद नहीं होता।
हर व्यक्ति एक ही घाट पर, एक ही मिट्टी में खड़ा होकर सूर्य को अर्घ्य देता है —
यह बताता है कि “प्रकृति के सामने सभी समान हैं।”
🌳 पर्यावरणीय दृष्टि से
यह पर्व पूरी तरह इको-फ्रेंडली है।
प्रसाद में उपयोग की जाने वाली हर वस्तु —
जैसे गन्ना, गुड़, फल, मिट्टी के दीपक, बाँस की डलिया — प्राकृतिक होती हैं।
इससे पर्यावरण प्रदूषण नहीं होता बल्कि स्वच्छता और हरियाली का संदेश जाता है।

💫 आध्यात्मिक अर्थ — आत्म-शुद्धि और संतुलन का पर्व
छठ पूजा मनुष्य को आत्म-संयम और आत्म-नियंत्रण की शिक्षा देती है।
चार दिनों का व्रत शरीर को विषमुक्त करता है और मन को शांत रखता है।
सूर्योपासना से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर होता है, बल्कि मानसिक ऊर्जा भी बढ़ती है।
यह व्रत यह भी सिखाता है कि
“जीवन में जो कुछ भी प्राप्त है, वह सूर्य की कृपा है —
इसलिए हमें आभार प्रकट करना चाहिए, न कि शिकायत।”


🪶 आधुनिक युग में बदलता स्वरूप
आज के दौर में लोग समय की कमी के बावजूद छठ पूजा को पूरे उत्साह से मनाते हैं।
ऑनलाइन सामग्रियों की व्यवस्था, डिजिटल प्रसारण, और सोशल मीडिया लाइव पूजा से यह पर्व परंपरा और आधुनिकता का संगम बन चुका है।
कई युवा भी अब इस व्रत में भाग लेने लगे हैं, जिससे अगली पीढ़ी में इसकी आस्था बनी रहे।

🌻 निष्कर्ष
छठ पूजा भारत की सबसे पवित्र और अनुशासित परंपराओं में से एक है।
इसका इतिहास हजारों साल पुराना है, पर इसका महत्व आज भी उतना ही जीवंत है जितना वैदिक युग में था।
यह पर्व न केवल सूर्यदेव और छठी माई के प्रति श्रद्धा व्यक्त करता है, बल्कि यह हमें सिखाता है —
स्वच्छता, संयम, पर्यावरण संरक्षण और कृतज्ञता का मार्ग ही सच्ची भक्ति है।
भले ही समय बदल गया है, पर छठ पूजा की मूल भावना —
“सूर्य को नमन, परिवार का कल्याण और समाज की एकता” —
आज भी हमारे जीवन में उजाला भरती है।

 

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